Monday, December 21, 2015

या अल्लाह

सर्द रातों का दर्द भी माशा अल्लाह,
उनका करीब आना सुभान अल्लाह!!
सरगो्शी से हाथों से मुँह को ढाँपना,
फ़िर खिलखिलाना वल्लाह-वल्लाह !!
क्या कहें कमसिनो की ये नज़ाकत,
चिल्मन उठाना फ़िर गिराना बवाह!!
सहमे-सहमे से इस गली से गुज़रना,
फ़िर चढ कर मुडेरो से ताकना आह!!
कब किसका क्त्ल कर दे क्या पता?
भोली सूरत,और ये सीरत याअल्लाह!!
बोधिसत्व कस्तूरिया ९४१२४४३०९३

Wednesday, October 21, 2015

Saturday, October 3, 2015

नवसृजन

धीरे-धीरे पुरवईया सी बहने लगी,
चन्द दिनों मे ही,मै सब सहने लगी!
पराया समझा था जिन्हे मैने कभी
मन से उन्हे ,अब अपना कहने लगी!! धीरे-धीरे पुरवईया ....
घर से घबराते हुये,हुई थी, मै विदा,
बहन और सखियाँ,छोड दी थी सदा
और अश्रुपूरित नयनो मे बहने लगी!! धीरे-धीरे पुरवईया ....
है प्यार का संवेग या कुछ मज़बूरियाँ,
घट रही है क्यूँ आज बाबुल से दूरियाँ?
पीर भी अपनी सब उनसे कहने लगी!! धीरे-धीरे पुरवईया ...
जीवनदाता भी क्यूँ पराये से लगने लगे?
पँख फ़ैलाकर नव स्वप्न क्यूँसज़ने लगे?
प्रेम मे उनके मै कैसे अब बहने लगी?धीरे-धीरे पुरवईया ....
नियति है हर बालिका की बस यही?
मान लूँ क्या सृष्टि की संरचना सही?
नवसृजन को ही परिवार कहने लगी!!धीरे-धीरे पुरवईया ....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा २८२००७

Tuesday, September 29, 2015

आस्था

इन भूली बिसरी यादों मे,
कुछ यादें शेष तुम्हारी हैं!
छोड गये तुम बीच भँवर,
पर ज़िन्दा अब भी यारी है!!
जब भी कभी पुकारा तुमने,
पुनःमिलन की तैय्यारी है!!
यह मिलना और बिछुडना,
जीवनक्रम फ़िर भी ज़ारी है!!
दूरियाँ और प्यार बढाती हैं,
संग-संग चलना दुशवारी है!!
प्यार करो और खूबनिभाओ,
आस्था केवल यही हमारी है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७


Saturday, September 26, 2015

जागो माँ, बहन और जहाँ की बेटियो,

हर चेहरे पर खुद खुदा ने लिख दिया है,
जो डर औ दब कर मरा,वो कब ज़िया है?
ज़हन मे बिठा, फ़ख्र से ज़िन्दगी जिएगे
गर्भ मे क्यूँ मरें,हमने क्या-क्या किया है?
कभी माँ,बहन,और कभी बनकर अर्धांगनी,
दुख-दर्द औ तेरी बलाओं को खुद लिया है!!
सन्तान-सन्तान मे फ़र्क खुदा ने तो नही,
खुदा के कुछ खुदगर्ज़ बन्दों ने किया है!!
माँ को मिले हक बच्चो की पैदाइश का,
पुरुषो ने हमेशा शोषण उसका किया है!!
कभी गरीबी की दुहाई,कभी मँहगी सगाई,
पर बेटे के ज़नम पर भोज़ ही दिया है!!
जागो माँ, बहन और जहाँ की बेटियो,
छीन लो पुरुषों से,जो खुदा ने दिया है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज ,सिकन्दरा,आगरा-२८२००७

Friday, September 25, 2015

समर्पण

मुझे फ़िक्र अपनी नही,
उनके ज़ज़्बात की है!
काटी जो उनके साथ,
केवल एक रात की है!!
कर दिया सब न्योछावर,
कहानी उस बात की है!!
गर देता उसे मै धोखा ,
रोती कहानी घात की है!!
विश्वास की पूँजी लुटा दे,
पर्याय ये आघात की है!!
एक संवेग मे नही बहा,
निष्ठा जल-प्रपात की है!!
दीप आशाओं के जलें,
समर्पण ये प्रभात की है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा-२८२००७

Saturday, September 12, 2015

अन्तस का क्रन्दन

माँ शारदे को वन्दन, माँ भारती को शत-शत नमन!
यह महाकाव्य नही, अपितु मेरे अन्तस का है क्रन्दन!!
मै कतई नही सूर और तुलसी ,ना ही हूँ मै कालिदास!
छ्मा प्रार्थना कर लिख रहा, धर अन्तस यह विश्व्वास!!
मेरे अन्तस की  ज्वाला को, अनुज समझ अपनायेंगे!
भाषा-साहित्य की त्रुटियों को नवाकुँर सोच बिसरायेंगे!!
है बोध नही मुझ ’बोधिसत्व’ को, गलत और सही का!
यह कोई लेखा-जोखा नही, किसी रोकड और बही का!!
"शान्ति" पुत्र मै, "प्रकाश" पुँज की तेजस्वी ज्वाला हूँ!
"कस्तू्रिया" हूँ कस्तूरी सा महकूँ, शायद मतवाला हूँ!!
साहित्य-सॄजन और संस्कृति की, मुझको समझ  नही!
मेरी रचनायें पढकर,क्यूँ दुनिया कवि मुझे समझ रही!!
शोषण-उत्पीडन का चिन्तक हूँ, करता रहा यही प्रयास!
कैसे मौन रहूँ,जब मस्तिष्क निरन्तर लगा रहा कयास!!
क्या यह समय नही? प्रजातँत्र को रामायण दर्शन की!
क्या यह समय नही, फ़िर कृष्ण और चक्र सुदर्शन की?
प्रजातंत्र -रख्वाले,कब तक"भारत"को गारत मे ढकेलेगे?
हमने तो सब झेला, क्या आने वाले भी ऐसे ही झेलेंगे?
इन रख्वालों ने ही, सीता को अब तक बदनाम किया!
क्यूँ कृष्कों -मज़दूरो के हित मे, नही कुछ काम किया?
उनके खून-पसीने की कमाई को व्यर्थ गँवाया जाता है!
लाखों डालर खर्च कर,कामन वैल्थ गेम कराया जाता है!
बिजली-पानी,शिछा-चिकित्सा को भी वो आज तरस रहे!
कभी बाढ, कभी सूखा, कभी आस्मान से ओले बरस रहे!!
आखिर अर्थ व्यवस्था मे,उसकी भागीदारी सुनिशिचित हो,
प्राकृतिक आपदा से पीडित,आत्महत्या को न बाधित हो!!
कोठी मे रहने वाले नेता-अभिनेता,महलों तक जा पहुँचे!
पर भाग्य भरोसे बैठा किसान खाद-पानी तक ना पहुँचे!!
यहाँ किसान धरती का सीना चीर, कैसे फ़सल उगा रहा?
वहाँ नेता का बेटा चुनाव मे,दारू-नोटो की गंगा बहा रहा!!
वर्षा का पानी पहले बाँधो मे बाँध,किसानो को बहलाते है!
फ़िर लाखो क्यूसेक पानी छोड,उनकी खडी फ़सल बहाते है!!
खून खौलता है,जब किसान भुख्मरी से आत्मह्त्या करता है!
सांसद केवल संसद मे विशेषाधिकार , प्रश्न उठाया करता है!!
कुछ मुआवज़ा  प्रदान कर,फ़िर सोने की  तैय्यारी होती है!
और बेबस जनता! स्वतंत्रता के इन पहरेदारों पर रोती है!!
अब प्रजातंत्र प्रजा नही, केवल गुन्डों के डन्डों से चलती है!
कुछ सरकारी कुछ पालतू गुन्डो,की गोदी अस्मत पलती है!!
सत्ता मे भी अब शुचिता और मर्यादा का कोई काम नही !
मात्र धोबी के कहने पर पत्नी त्यागे, ऐसा कोई राम नही!!
अब भारत माँ भी आज़ादी के परवानो की सोच२ रोती है!
तुष्टीकरण,जातिवाद,आरछण से पजातंत्र  खोख्ली होती है!!
जब तक भ्रष्टाचार भगाने को,हर घर कृष्ण नही पैदा होगा!
सत्य अहिंसा के चर्खे नही,हर हाथ चक्र-सुदर्शन जैसा होगा!!
तब माँ भारती के मस्तक पर भी,मुकुट कोहिनूर का होगा!
किसान-मज़दूर खुशहाल, वो दिन भारत के गुरूर का होगा!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज,सिकन्दरा,आगरा-२८२००७

सम्बोधन

रिश्तों की गर्माहट,सिर्फ़ सम्बोधन से होती है!
वर्ना हर लडका सर, हर लडकी मैडम होती है!!
माँ,बहन और पत्नी, कितने नज़दीकी रिश्ते है?
समझो जो अन्त्तस से,वरना  ये भी सस्ते है!!
माँ वो देवी जिसने तुझको यह संसार दिखाया!
गीले मे खुद सोकर, सूखे मे हरदम तुझे सुलाया!
खुद भूखी रहकर भी, तुझे पंच पकवान खिलाया!!
बहन वही है जिसने तेरा ये पूरा परिवार बनाया!
रिश्तो की बाँध डोर अपने हाथों का झूला बनाया!!
भाई-भाई तो हमेशा लडते और झगड्ते रहते है !
माँ-बहन तेरी खुशहाली की सदा कामना करते है!!
पत्नी वो देवी है जिसने तुझे पूर्ण पुरुष बनाया है!
बन कर जीवन साथी हर झंझावत मे सहलाया है!!
शारीरिक,मानसिक,भौतिक सुख की भन्डार यही है!
कभी मेनका,कभी लछ्मी,कभी दुर्गा अवतार यही है!!
बेटी दो घर की लछ्मी,इक मे आये दूजे अपनाये!
है सत्य बिन इनके,सृष्टि का पहिया ही रुक जाये!!
इन रिश्तों को जिसने जब भी कभी ठुकराया है!
उसने इस तन मे भी पशु मस्तिष्क ही पाया है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा-२८२००७

Monday, September 7, 2015

चाहता हूँ!

शहर से दूर फ़िर मै गाँव जाना चाहता हूँ!
छल-फ़रेब से फ़कत गुरेज़ पाना चाहता हूँ!!
आपको मुबारक नियत के ये झूठे पैबन्द,
मै  छिपी हिमाकतों को भुलाना चाहता हूँ!!
गये दिन रिश्तों को संज़ीदगी से निभाने के,
रिश्तो के क्त्ल की दास्ताँ सुनाना चाहता हूँ!!
ज़िन्दगी मे अब कितनी तक्क्लुफ़ हो गई है,
दिल और ज़ुबाँ के फ़र्क को मिटाना चाहता हूँ!!
बुझ गये हैं चिराग बहन-बेटी की इज़्ज़त के,
उन चिरागों को फ़िर र्रौशन बनाना चाहता हूँ!!
है ज़रूरत अपनी इबारत फ़िर से लिखने की,
अंग्रेज़ियत ने करा सफ़ाया, बताना चाहता हूँ!!
हम भले,हमारी तह्ज़ीब है सबसे चंगी-भली,
फ़िर उसको उसका ओह्दा दिलाना चाहता हूँ!!
जो नस्ल अपनी ज़मीन खोती चली जा रही,
उस फ़सल और नसल को जगाना चाहता हूँ!!
बोधिसत्व कस्तूरिया२०२नीरव निकुन्ज,सिकन्दरा, आगरा२८२००७

Tuesday, July 14, 2015

उत्तम प्रदेश

समाचार उत्तम प्रदेश से यह आया है,
किसी प्रशासनिक अधिकारी ने आज,
शासन को  अधिकारो हेतु जगाया है!!समाचार उत्तम प्रदेश
है इतिहास साक्छी इस क्रन्दन का-
सत्ता हेतु संघर्ष युगो से होता आया है!!समाचार उत्तम प्रदेश
पर अब उल्टी गंगा यहाँ बह चली,
शासक-शासक को सत्ता ने भरमाया है!!समाचार उत्तम प्रदेश
कानून-नियम सब सत्ता की बाँदी हैं,
सब झन्डा-ड्न्डा की ही  तो माया है!!समाचार उत्तम प्रदेश
सत्ता आगे पत्र-पत्रिका,पत्रकार बौने है,
नौकरी -मुआवजा पुरुस्कार पाया है!!समाचार उत्तम प्रदेश
जो इनसे टकराया है-निलम्बन,जाँच,
और कारागार के घेरे मे  आया है!!समाचार उत्तम प्रदेश
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुज, सिकन्दरा आगरा२८२००७

Friday, July 10, 2015

छितिज़

कभी छितिज़ के उस पार से भी निहारा करो,
रह गया हूँ इस पार मै, तुम ही पुकारा करो!!
हर सुबह जब सूर्य की प्रथम किरण उगती है,
भोर का नही,स्वप्न टूटने का ही इशारा करो!!
दिन भर की व्यस्तता्यें,साँझ तक बोझिल है,
डूबते सूर्य को अंक मे भरने का सहारा करो!!
क्यों दूरियाँ हम, छितिज से नापते रहते है ?
आँखो मे बसी रहो,अहसास मत दुबारा करो!!
बो्धिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Friday, April 24, 2015

इन्सानियत रोयेगी, शतरंज़ की मज़ार पर!

हर बरस लगेगे मेले शहीदो की मज़ार पर
पर कोई नही रोया ,उसके इस अयार पर !!
है नही केवल यह सबब इस ज़िन्दगानी का,
क्यूँ नही सोचा गजेन्द्र ने अगले गुबार पर!!
कोई किसी का खुदा बेशक कभी होता नही
माँ-बेटियों को क्यों छोड गया मझधार पर?
राजनीति चलती रहेगी माफ़ी की आड मे,
पर मानवता ठिठक गई है, इस बयार पर!!
कमीशन और इन्क्वायरी पर बैठेंगी बिसातें,
इन्सानियत रोयेगी, शतरंज़ की मज़ार पर!!

बोधिसत्व कस्तूरिया एड्वोकेट २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Wednesday, April 15, 2015

पेप्सी आईपीएल

खेल-खिलाडी बिक रहे ये कैसा इन्डिया का त्योहार?
लाखों यूनिट बिजली प्रतिदिन फ़ूँके,है कैसा व्यभिचार?
बिजली पानी को तरस रहे किसान,खेत और खलिहान
औद्दोगिक उत्पादन सिर पटके,सट्टेबाजी की जयकार!!
स्टूडैन्ट छोड पढाई,डेयरडेविल,नाईट राइडर्स पर खेले दाँव,
महिलायें तरस रही,कैसे देखें बहुओं पर सासू अत्याचार?
बुड्ढो ने चाहे जीवन मे कभी न खेली होय हाकी-क्रिकेट,
आस लगाये बैठे सारे,कब होवे चीयर्से-लीडर का दीदार?
४५ दिन को भूल गये सब शाम की बैठक,और गपशप,
सो गई संस्कृति सात तालों मे,है ६८ वर्षो का उपहार!!
पहले मुगलो,अंग्रेज़ों फ़िर अंग्रेज़ी-पिट्ठुओ के रहे गुलाम,
ऊपरी-कमाई मे डूबे,भूल गये"सादा जीवन उच्च विचार"!!
इस दुनिया मे सब कुछ बिकता है,यह है जीवन आधार,
पेप्सी आईपीएल लूटे कहकर"ये है इन्डिया का त्योहार?"

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा २८२००७

Monday, April 13, 2015

बैसाखी दी लख लख् वधाईयाँ

गाते फ़िरें बैसाखी दी लख लख्  वधाईयाँ
कुडियाँ उछाला मारती ज्यो होवे सगाईयाँ!
उन्नू के दसियाँ चौपट हो गई फ़सलाँ ?
कुडियो कैवी खुशियाँ ओर कैवी वधाईयाँ?
फ़सलाँ दा त्योहार कैसे जट्ट मणावे ?
जब कुदरत की मार लगावे अँगडाईयाँ !!
झूठी-झूठी मण को दिलासा देवे  बेबे ,
कोई गल नही पुत्तर रब कीसौ परछाईयाँ !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७

Friday, March 27, 2015

"भारत रत्न अटल"

सादगी और संस्कृति के उपासक सरल,
नाम उनका है वाजपेई बिहारी  अटल!!
कवि-हृदय,मॄदु-भाषी,हास्य के पर्याय है,
विद्वेष-ईर्षा से परे,है नितान्त निश्छल!!
साहित्य और संस्कृति के दृढ-प्रणेता,
त्यागी-तपस्वी सा जीवन है अविरल!!
कामना से परे,भावना से भरे ओजस्वी,
हिन्द के युग-पुरुष है"भारत रत्न अटल"!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज,सिकन्दरा,आगरा २८२००७

Saturday, March 21, 2015

गाँव

कैसे बदले बदले गाँव ?
नही मिल रही है छाँव !
बद्ध-बैल गायब है सब,
ट्रैक्टर-ट्राली पसारें पाँव!!
मेल-मुहब्बत नही मिले,
इक-दूजे पर मारें दाँव!!
हर आँगन मे दीवारें है,
कऊए सी कर रहे काँव!!
साडी-बिलोज़ न दीखें,
जीन्स-टाप की है छाँव!!
लल्ला चले गये लन्डन,
खँडहर ह्वे गये हैं गाँव!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा ,आगरा २८२००७

Monday, March 16, 2015

होली का त्यौहार

हर किसी के ज़हन मे इश्क सवार है
है ये बदहवासी या होली का बुखार है?
हर कोई अपने ही रंग मे सराबोर है,
हर किसी को अपनी का इन्त्ज़ार है!!
ना बोलियों का ,ना मज़हब का बैर,
इतनी मुहब्ब्त कि मौला भी बेज़ार है!!
कया इसी दिन के लिये पूरे साल,
दंगे-फ़साद करते है,?येकैसा प्यार है!!
सब मिलके नाचो-गाओ एक साथ,
कि आया फ़िर होली का त्यौहार है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

छल और छूठ

छल और छूठ है सत्ता के गलियारे मे,
फ़र्क नही कोई दुश्मन और प्यारे मे!
था जो भी  दुश्मन चुनाव से पहले,
फ़र्क नही है फ़िर जीते और हारे मे !!
सभी समीकरण फ़ेल होते देखे हमने,
पर वो भूल गये फ़िर क्या था नारे मे?
मन्दिर-मस्ज़िद का मुद्दा् या ३७० का,
कोरी हवा बाज़ी है जनता के बारे मे !!
पर "यह जनता है ,सब जानती है "
पर वो बिक गये केवल एक इशारे मे!!
छल और छूठ पर देश-भक्त बनते हैं,
है फ़र्क नही भाई चचेरे और मौसेरे मे!!
अपना पेट भरो, जनता को मरने दो,
वो मरी बाढ-सूखा औ नेताओं नारे मे!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Sunday, March 15, 2015

"सबका साथ-सबका वि्कास"

गर गद्दार छुपे है सीमा पर ,
कमी नही है पहरेदारों की !
भून-भून के रख देगे छाती
हम मसरत के रखवारो की!!
वक्त गया छमा-याचना का,
आया तीर,तोप,तलवारों की!!
भूल गये सबक बाँग्ला देश,
और कारगिल के मारों की ?
"सबका साथ-सबका वि्कास"
मंत्र नही माटी के गद्दारों की!!
हम हाथ बढाये मित्रता का,
है नही ये कायर-बीमारों की!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

होली

श्याम के रंग मे जब रंग जावे राधा प्यारी,
तब समझो,अब सज गई रंगो की फ़ुलवारी!
हर ग्वाला है कान्हा,हर बाला बरसाने बारी,
सज-धज के ठाडे, वॄज मन्डल के नर-नारी!!
स्वप्न सजन के मन मे सजाये निकल पडे,
ढूँढ रहे कौन गली छिपीखडी है राधा हमारी!!
है सब चौकन्ने,ज्यों छिडी हुई है जंग पुरानी
कर डारें बेहाल, जो मिल जावे कॄष्ण मुरारी!!
आज भूल गये बरसन के सब वो बैर पुराने,
रंग लगाकर,भंग चढाकर बोले-जैहोय तिहारी!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दर आगरा २८२००७

Tuesday, February 24, 2015

दर्द

कभी किसी और से ,
दर्द का ज़िकरा ना कीजिये,
धीरे-धीरे ये यूँ ही मिट जायेगा !
जब तक चाहे सालते रहिये,
है उम्मीद ये"बोधिसत्व"
जीतूँगा मै, और यह पिट जायेगा!!
घुट रहा हूँ,यह सोच कर,
तब क्यों नही इज़हार था किया?
बढ गया गैप क्यूँकर फ़िट जायेगा!!

Friday, February 13, 2015

देखी नही

इस कदर राजनीतिक बेचारगी देखी नही !
एक दूजे पर तंज़ की आवारगी देखी नही!!
अब गले मिलने से भी है क्या फ़ायदा ?
आईने उतार दी जो,वो ख्वारगी देखी नही!!
पढे-लिखे होने का जो स्वांग करते रहे,
ज़हालत की ऐसी, बानगी कभी देखी नही!!
पढे-लिखे बैठे रहे बस, बन्द कमरों मे !
सडक छापों ने छापी शानकी देखी नही !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा २८२००७

Friday, February 6, 2015

सूरज अभी डूबा नही,

 सूरज अभी डूबा नही,
ज़रा शाम होने तो दो !
मैं खुद ही लौट आऊंगा,
ज़रा नाकाम होने तो दो !!
क्यूँ बदनाम करते हो ?
ज़रा सा नाम होने तो दो!!
लगी है,अभी-अभी आँख,
ज़रा चैन से सोने तो दो !!
उसे ढूँढ ही लूँगा बज़्म मे,
शमा रौशन होने तो दो !!
कैसी गफ़लत है ज़नाब ?
गम मे किसी खोने तो दो!!
हँसता रहा ता ज़िन्दगी,
मय्यत पर ही रोने तो दो!!
गैरों के शेरों से थे नाम्चीं,
अपने भी कुछ होने तो दो!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Thursday, February 5, 2015

दिल्ली जीतेंगे!

पहले जीता भारत, अब भारत का दिल-दिल्ली जीतेंगे!
विश्व बन्धुत्व का मंत्र, अब दुनिया वाले हमसे सीखेंगे !!
न कोई छोटा और न कोई बडा होगा,ये सुन ले दुनिया,
देश दीवारों मे नही कैद हो, न अब सीमांओ को खीचेंगे!!
भारत रहा सदा से,संस्कॄति,धर्म और आध्यात्म का गुरु,
प्रेम-सदभाव,और सहिष्णुता से, इस बगिया को सीचेंगे !!
सत्य,अहिंसा की प्रतिमूर्ति,बापू-गाँधी की है शपथ तुम्हे !
आतंक्वाद और अत्याचार से,अब कभी ना आँखे मीचेंगे !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुँज, सिकन्दरा आगरा २८२००७

Tuesday, February 3, 2015

मधुर-मिलन

तुम सबसे सुन्दर हो
उससे सुन्दर बतियाँ !
पास नही हूँ अब तेरे,
आस निहारे अखियाँ !!
मन-मन्दिर मे झाँकूं,
कैसे मिलेंगी सखियाँ ?
हर जतन अकारथ है,
बीत रही अब रतियाँ !!
रात चाँदनी लिखती है,
प्यार भरी वो बतियाँ !!
अपने अंक भरूँ तुझको,
जाग न पायें सखियाँ !!
हर आहट है अहसास,
मधुर-मिलन-बतियाँ !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिक्न्दरा आगरा २८२००७

Monday, January 26, 2015

गणतंत्र

जन से गण तक अब  गणतंत्र जगा है,
विश्व पटल पर भारत का अब डंका है!!
अमरीका,रूस,चीन,औ जा्पान सभी जाने,
भारत की साख,नही किसी की शंका है!!
"वसुधैव कुटुम्बकम" का गुणगान यही
छोटे-बडे देश नही नेपाल,भूटान,लंका है!!
"सबका साथ-सबका विकास" मंत्र हमारा
फ़िर कैसे आपस मे विरोध की आशंका है?
६६वर्ष मे परिपक्क्व हुआ गणतंत्र हमारा
समझ गये वो-जिनको मोदी से शंका है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Thursday, January 15, 2015

इंटरनेट


फेसबुक सा फेस है तेरा, गूगल सी हैं आँखें

एंटर करके सर्च करूँ तो बस मुझको ही ताकें

रेडिफ जैसे लाल गाल तेरे हॉटमेल से होंठ

बलखा के चलती है जब तू लगे जिगर पे चोट

सुराही दार गर्दन तेरी लगती ज्यों जी-मेल

अपने दिल के इंटरनेट पर पढ़ मेरा ई-मेल

मैंने अपने प्यार का फारम कर दिया है अपलोड

लव का माउस क्लिक कर जानम कर इसे डाउनलोड

हुआ मैं तेरे प्यार में जोगी, तू बन जा मेरी जोगिन

अपने दिल की वेबसाईट पर कर ले मुझको लोगिन

तेरे दिल की हार्डडिस्क में और कोई न आये

करे कोई कोशिश भी तो पासवर्ड इनवैलिड बतलाये

गली मोहल्ले के वायरस जो तुझ पर डोरे डालें

एन्टी वायरस सा मैं बनकर नाकाम कर दूँ सब चालें

अपने मन की मेमोरी में सेव तुझे रखूँगा

तेरी यादों की पैन ड्राइव को दिल के पास रखूँगा

तेरे रूप के मॉनिटर को बुझने कभी न दूँगा

बनके तेरा यू पी एस मैं निर्बाधित पावर दूँगा

भेज रहा हूँ तुम्हें निमंत्रण फेसबुक पर आने का

तोतों को मिलता है जहाँ मौका चोंच लड़ाने का

फेसबुक की ऑनलाईन पर बत्ती हरी जलाएंगे

फेसबुक जो हुआ फेल तो याहू पर पींग बढ़ायेंगे

एक-दूजे के दिल का डाटा आपस में शेयर करायेंगे

फिर हम दोनों दूर के पंछी एक डाल के हो जायेंगे

की-बोर्ड और उँगलियों जैसा होगा हमारा प्यार

बिन तेरे मैं बिना मेरे तू होगी बस बेकार

विंडो से देखेंगे दोनों इस दुनिया के खेल

आइकन के डिब्बों की होगी लंबी रेल

फिर हम आजाद पंछी शादी के सी पी यू में बन्ध जायेंगे

इस दुनिया से दूर डिजिटल की धरती पे घर बनाएँगे

फिर हम दोनों प्यासे-प्रेमी नजदीक से नजदीकतर आते जायेंगे

जुड़े हुए थे अब तक सॉफ्टवेयर से अब हार्डवेयर से जुड़ जायेंगे

तेरे तन के मदरबोर्ड पर जब हम दोनों के बिट टकराएँगे

बिट से बाइट्स, फिर मेगा बाइट्स फिर गीगा बाइट्स बन जायेंगे

ऐसी आधुनिक तकनीकयुक्त बच्चे जब इस धरती पर आयेंगे

सच कहता हूँ आते ही इस दुनिया में धूम मचाएंगे

डाक्टर और नर्स सभी दांतों तले उंगली दबाएंगे

जब ये बच्चे अपना राष्ट्रीय गीत औये- औये- नहीं

याहू-याहू चिल्लायेंगे ….. याहू-याहू चिल्लायेंगे……

याहू-याहू चिल्लायेंगे ….. याहू-याहू चिल्लायेंगे …

Monday, January 12, 2015

हम कूडा बीनने वाले

हम कूडा बीनने वाले
सभी का बीनते है !!
धर्म नही कर्म करते,
नही कुछ छीनते है!!
क्योँ लोग परेशान है?
सूखी रोटी जीमते हैं!!
हर मज़ह्ब हमारा है,
सभी का बीनते है !!
लोग विदेशी कहते है,
हमे नही चीन्ह्ते हैं!!
यही रूखी सूखी मिली,
इसी को चीन्हते हैं!!
खुदा तालों मे रखो,
मुफ़लिसी बीनते है!!

Saturday, January 10, 2015

चेहरा

ये खूबसूरत चेहरा,क्यूँ हाथों छुपा रहे हो?
लगता है जाने-अनजाने हमे लुभा रहे हो?
कभी इन हाथों की मेंहदी धुलने ना पाये,
जो साजन है दूर,क्या उनको बुला रहे हो?
हाथों का चूडा- अभी तक खुला भी नही,
और बेवजह न जाने ,किसे रुला रहे हो ?
तुम बेशक एक नन्ही, कमसिन कली हो,
फ़ूल बनने का अहसास,क्यूँ दिला रहे हो?
हटा लो जो हाथ पल भर , इस चेहरे से,
छितिज़ पर धरती-आस्मान मिला रहे हो?
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिक्न्दरा आगरा २८२००७

Friday, January 9, 2015

तुम सास नही मेरी माँ हो

है सत्य यही,तुम सास नही मेरी माँ हो,
मॄत्यु लोक मे ढूँढ रहा मै, आज कहाँ हो?
व्याकुल मन विछिप्त सा प्रतीत होता है,
सब के सन्मुख हँसता,पर भीतर रोता है!!
तुम उपेन्द्र ,गिरीश,हरेश की माता थी,
पर आज कहूँ, मेरी तो तुम भ्राता थी!!
बीना, मीरा,और आभा की जननी थी,
है सत्य यही ,मेरी तो तुम भग्नी थी!!
जीवन संघर्षों की तुम एक कहानी थी,
सुकेश,सौरभ,निर्मन्यु,सार्थक की नानी थी!!
करुणा,पुष्पा,अनुराधा की तुम सास सही
फ़िर जन्म इसी कुल मे लो, आस यही !!
गरिमा,सौम्या,विपुल सबकी तुम दादी थी,
क्रोध-अहंकार नही,प्रेम-सद्भाव की आदी थी!!
कैसे सुन पाऊँगा वो निश्छल अट्टहास,
क्योंकि आज नही हो ,तुम मेरे पास !!
अब नही मिलेगी मुझको कोई शबासी,
सोच-सोच यही छाई है,अब एक उदासी!!
दया, छमा, सेवा-सदभाव  और परमार्थ,
ये थे आदर्श तुम्हारे, और ये ही स्वार्थ!!
माँ-पिताजी के प्रयाण पर,था नही अनाथ,
पर अब लगता,जब छोड गई तुम साथ!!
तुम कहती थी,नर सेवा ही नारायण सेवा,
उससे बडा ना ओई देवी,और नाकोई देवा!!
कोशिश यही रहेगी,तेरे आदर्श ही अपनाऊँ,
पर विश्वास नही,कैसे-कभी तुझे भुला पाऊ!!
जीवन-मरण  विधि का लेखा, विश्राम करो!
संक्ल्प करो- जीवन भर सेवा निष्काम करो!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७