Wednesday, December 19, 2007

तुम ही तुम हो

जीने का तो मतलब तब है,

साथ हमारे पास में तुम हो!

दिन में बहुत hein

मिलन


हर मिलन का अंजाम जुदाई क्यों है?

अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें !

दिल में लाखों ज़ज्बात मचलते रहते हैं ,

जाने कौन सी बात ,सारी रात जगाती है हमें?

मिलने पर कैसे इन बातों का इजहार करूं?

सोचते-सोचते ,येही बात हँसाती है हमें !

उनका प्यारा सा चेहरा और प्यारी बातें,

सिरहन सी मचाके,सारी रात जगाती है हमें!!

याद में उनकी सारी रात जगे तो क्या?

आज भी जाग सकूं यही बात सताती है हमें!

मेरे हँसने का अंजाम रुलाई क्यों है?

अब तो हर वक़्त यही बात रुलाती है हमें !! हर मिलन का अंजाम ...........

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा





Friday, November 30, 2007

ताज महल


मेरी हसरत थी कि मेरे ज़हन के हर दरीचे से ताज महल नज़र आये !

जिसमे हो धूप की तपिश , पर चांदनी की नम ओस से नहाये !! मेरी हसरत थी कि.........

क्यूंकि इसमे मोहब्बत और इश्क की दास्तान बाबस्ता है !

पर आज तो इस शहर में पानी महंगा और खून सस्ता है !! मेरी हसरत थी कि....

अब तो हद हो चुकी सनम ,ताज पर भी आतंकी साये हैं !

बड़ी हसरत से दीदार को आये थे ,यहाँ भी पुलिस और मेटल डिटेक्टर छाये हैं !! मेरी हसरत थी कि......

अमन चैन कहाँ खो गया ?ढूँढता फिरता है शायर -


समझ नहीं आता आदमी बहादुर है या कि फिर हो गया कायर? मेरी हसरत थी कि.....

बोधिसत्व कस्तूरिया

Monday, November 5, 2007

sheetalta


छाया हो वृक्षों की,

मेघों की, या फिर

काले घने केशों की-

शीतलता देती है प्रथक-प्रथक !

सुर लहरी हो,

कोयल की,

रिमझिम की, या फिर

विरह गीतों की-

तृप्ती देती है प्रथक-प्रथक !

जलधारा हो-

झरने की,

वर्षा की या फिर

प्रेयसी के नेनों की -

आकर्षण देती है प्रथक-प्रथक !! बोधिसत्व कस्तूरिया







Sunday, November 4, 2007

untardwand



मेरे अंतस का अंतर्द्वंद,


उस अंकुर का

जो प्रस्फुटित होना चाहता है !

उसे पा लूं ,

गले से लगा लूं,या

नोच कर मिटा दूं,

जो प्रतिष्ठित होना चाहता है !
दोषी कौन है?

मृतप्राय माली ,

शुष्क धरती,या

वह कुंठित बीज

जो अंकुरित होना चाहता है !

इनके अतरिक्त भी कोई और है

हाँ संभवतः पर्यावरण,

जो प्रतिबिम्बित होना चाहता है !! बोधिसत्व कस्तूरिया

Tuesday, October 30, 2007

एक चीख
में पीपल का पुराना पेड़
प्रतिवर्ष पीत परिधानों
को पलटते पलटते ,
प्रियदर्शनी प्रेयसीयों को प्यारा हो गया !
परिक्रमा कर प्रज्वलित करती हैं दीपक,
क्योंकि उन्हें मेरे ऊपर,
ब्रह्मवास का वहम हो गया !!
परन्तु कोई नहीं सुनता ,
मेरे ब्रह्म की चीख-
"पुण्य प्राप्ती के पागलो !
पलायन करो,पीछा छोडो ,क्योंकि-
में अब भीतर से खोखला हो गया!! बोधिसत्व कस्तूरिया

Sunday, October 21, 2007

yauvan

यौवन के दिन कुछ ऐसे बीते,जैसे कुम्भ धरे हों रीते !
कुछ करने कि उत्कंठा ,कुछ पाने कि अभिलाषा!
समझ नहीं आती जीवन कि परिभाषा !!
समय फटे-चीथड़े सीते, यौवन के दिन................. !
युवा-शक्ति दिग-भ्रमित भटकती,
माँ-बापों के आँख खटकती!
शिक्षक के है गले अटकती !
सेवा - योज़न पर पैर पटकती,
जीवन-धारा सूख न जाये आँसू पीते ,यौवन के दिन ...............!
अपराधों की बाढ़ जो आये ,
कोई इन्हें न दोष लगाए !
दिशा दिखाने कोई तो आये !!
और इन्हें फिर गले लगाए !
टूट गए हैं आशाओं के फीते, यौवन के दिन.................!

बोधि सत्व कस्तूरिया

Wednesday, September 12, 2007

माँ भारती को नमन ! माँ शारदे ऐसे उदगार दो !
"जन गन मन " कि गुंजन को अब नया हुंकार दो !!
सरस्वती के साधको,लेखनी को नवधार दो !
लिख चुके बहुत प्रणय गीत,वीर रस पर सब वार दो !!
माँ भारती को ......................
स्वतंत्रता शिशु से नव योवना बनी ,अब उसे फिर श्रृंगार दो !
टेगोर , शरत, इक़बाल विस्मृत ना होन ,साहित्य को नव फुहार दो !!
माँ भारती को ......................
विज्ञानं की ऊंचाइयां ,विश्व में स्थापित कर चुके हम !
श्रम साधको ! वीर भारती हो तुम ,दुश्मनों पर अब प्रहार दो !!
माँ भारती को नमन ! माँ शारदे ऐसे उदगार दो

प्रीत कि रीत कितनी चुप कितनी शीत१
सुख देता अतीत, दुःख देता अतीत !
वर्तमान का प्रतिक्षण एक सुहाना गीत,
युग भी जाये पल दो पल में बीत!!
संशय भरे भविष्य कि घड़ियों से भयभीत ,
ना जाने कब छिन् जाये यह जीवन संगीत !!
दीपावली
कैसी तिमिराछादित मेरी अंतस अयोद्ध्या ?
कलियुग में रावन कर गया ,
राम को समूचा आत्मसात !
और दे गया ,
मेरे विवेक को पक्षाघात !
आशा के भग्नावशेष खडे हैं,
जीर्णोद्धार का भ्रम करने को !
दीपावली कितनी अक्षम है ,
शापित तम कम करने को !!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा २८२००७