Thursday, May 23, 2013

तुम चाहतों का समन्दर


तुम चाहतों का समन्दर सजाते रहे
हम बिला वजह ये आँसू बहाते रहे !
खामोश हो गई पत्थरों से टकराहट,
बनाकर घरोंदे रेत के हम मिटाते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर
सैलाब समन्दर मे कब शान्त है?
उसी मे मदहोश हम गोते लगाते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर
पर याद रखना तुम भी ये सदा,
ना रहेगी जवानी,जो तुम इतराते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर
हम तो शैदाई है तेरे ज़ल्वे के बस,
दिखा के जिसे तुम यूँ कतराते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
म चाहतों