Wednesday, October 22, 2008

दीपावली


कैसी तिम्रछादित मेरी अंतस अयोध्या ,
कलियुग में -
रावन कर गया ,
राम को समूचा आत्मसात !
और मेरे विवेक को दे गया ,
यौवन में ही पक्षाघात !!
आशा के भग्नावशेष खडे हैं ,
जीर्णोधार का भ्रम करने को !
दीपावली कितनी अक्षम है ,
शापित तम कम करने को!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

Monday, October 13, 2008

दीपावली


जब साँझ ढले ,कोई दीप जले ।
समझो दीपावली आयी है !!
जब कोई राग जगे ,
जब कोई आग लगे,
समझो दीपावली आयी है !!
जब कोई नार सजे ,
जब कोई तार बजे,
समझो दीपावली आयी है !!
जब शंख बजे ,
जब ढोल बजे,
समझो दीपावली आयी है!!
जब गणपति का हो पूजन,
जब लक्ष्मी का हो आवाहन ,
समझो दीपावली आयी है !!
जब बच्चों का हो क्रंदन ,
जब पटाखों का हो घर्षण,
समझो दीपावलीआयी है !!
जब खील खिलोनो का हो आवंटन,
जब पुष्प -मिष्ठानों का हो वितरण ,
समझो दीपावली आयी है !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007