पर्यावरण
कभी "सूनामी",कभी"लैला",तो कभी"फ़ैट" है !
पता नही प्रक्रति के गर्भ मे कब,कहां कया सैट है ?
प्रक्रति से प्रहसन,अब कितना महगा पड रहा?
ग्लोबल वार्मिंग से समपूर्ण विश्व कैसे सड रहा?
पेड-पौधे काट ,सडक और भवन बन रहे !
खेत -खलिहान खत्म ,बहु-मन्ज़िले तन रहे!!
अन्न-जल की अब ,समस्या बहुत गम्भीर होगी !
प्रक्रति से दूर होते ही,काया हो गई है कितनी रोगी?
ओज़ोन मे भी अब तो बडा छेद हो चुका है !
प्रक्रति को रौद मानव,स्वयंभू देव हो चुका है!!
आलम यही गर रहा ,तो विश्व का विनाश सन्निकट है!
परमाणु-युद्धका भय नही,पर पर्यावरण समस्या विकट है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
Tuesday, June 8, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)
