Wednesday, December 19, 2007

तुम ही तुम हो

जीने का तो मतलब तब है,

साथ हमारे पास में तुम हो!

दिन में बहुत hein

मिलन


हर मिलन का अंजाम जुदाई क्यों है?

अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें !

दिल में लाखों ज़ज्बात मचलते रहते हैं ,

जाने कौन सी बात ,सारी रात जगाती है हमें?

मिलने पर कैसे इन बातों का इजहार करूं?

सोचते-सोचते ,येही बात हँसाती है हमें !

उनका प्यारा सा चेहरा और प्यारी बातें,

सिरहन सी मचाके,सारी रात जगाती है हमें!!

याद में उनकी सारी रात जगे तो क्या?

आज भी जाग सकूं यही बात सताती है हमें!

मेरे हँसने का अंजाम रुलाई क्यों है?

अब तो हर वक़्त यही बात रुलाती है हमें !! हर मिलन का अंजाम ...........

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा