Monday, December 21, 2015

या अल्लाह

सर्द रातों का दर्द भी माशा अल्लाह,
उनका करीब आना सुभान अल्लाह!!
सरगो्शी से हाथों से मुँह को ढाँपना,
फ़िर खिलखिलाना वल्लाह-वल्लाह !!
क्या कहें कमसिनो की ये नज़ाकत,
चिल्मन उठाना फ़िर गिराना बवाह!!
सहमे-सहमे से इस गली से गुज़रना,
फ़िर चढ कर मुडेरो से ताकना आह!!
कब किसका क्त्ल कर दे क्या पता?
भोली सूरत,और ये सीरत याअल्लाह!!
बोधिसत्व कस्तूरिया ९४१२४४३०९३