कभी ओस को मुट्ठी मे ना समेटो,
आसमाँ ज़मीं पर उतर आयेगा !
आँचल को तुम मुँह पर ना लपेटो,
नमाज़ी का इमाँ, बिखर जायेगा !!
जो अल्फ़ाज़ ना आये लबों तक,
निगाहो -निगाहों, संवर जायेगा !!
है कशिश इन आँखों मे इतनी,
दर्द का अह्सास, ठहर जायेगा !!
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Monday, December 24, 2012
Sunday, December 23, 2012
दिल्ली का दर्द
दो दिन से दिल्ली लुट रही और,
हम सब अपने बँगलों मे पडे हुये हैं!
ज़न्तर मन्तर,इन्डिया गेट
दिल्ली पुलिस के आगे नत मस्तक खडे हुये है!
बच्चे -बच्ची चीख चीख चिल्ला रहे,
"रेपिस्ट को फ़ाँसी का फ़रमान निकालो,"
वर्ना इस सर्दी मे भी हम यही अडे हुये है !!
पानी की बौछार सहेंगे,
लाठी की हम मार सहेंगे,
शन्ति पूर्ण प्रदर्शन से दामिनी संग खडे हुये है!!
फ़िर द्रौपदी का चीर हरण हुआ है,
फ़िर नारी की अस्मिता का छरण हुआ है,
जागो-जागो कॄष्ण! तुम कहाँ सोये पडे हुये हो!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
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