Saturday, December 21, 2013

नव वर्ष 2014

जतन चाहे तुम कितने भी करो,
उडान चाहे तुम कितनी भी भरो,
लौट कर  धरा पर ही आना है!
लम्हों का जाना कोई जाना है!
जाने के सत्य से ना तुम डरो !!जतन  चाहे...
अन्तिम श्वास जब तुम पाओगे,
लौट फ़िर नही तुम  आओगे !
कहता हूं परमार्थ कुछ भी करो!! जतन  चाहे...
पकॄति का यह शाश्वत नियम है,
कोंपल फ़ूटने का यही क्रम है !
पकॄति का अनुसरण ही करो!! जतन चाहे.....
है शपथ तुम्हे इस
नव वर्ष की,
नये सदभाव की, नये हर्ष की ,
पुरातन मे,कुछ नवरंग भी भरो!!जतन चाहे.....
बोधिसत्व  कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिक्न्दरा आगरा २८२००७

Wednesday, December 11, 2013

फ़िर तुम्हारा होना चाहता हूँ

न मै तुम्हे खोना चाहता हूं ,
न तुमसे दूर होना चाहता हूं !
बस की है जो तुमसे बेवफ़ाई,
शर्मिन्दगी मे रोना चाहता हूं!!
इकरार तुमसे मै करता हूँ ,
दिल-ओ-जान से मरता हूँ,
फ़रिश्ता तो मै हरगिज़ नही ,
पर इन्सान होना चाहता हूँ !!
कभी कोई अपनो से रूठता है,
इससे अपनो का दिल टूट्ता है,
दिल मे तुम्हारे रहता था मै ,
फ़िर तुम्हारा होना चाहता हूँ!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Thursday, September 26, 2013

चन्द आशार

किसी और से ना ये ज़िक्र कर,
मै मुहब्बत मे होश खो चुका !
उसने मुझे कभी अपनाया नही,
फ़िर भी मै उसी का हो चुका !!
इश्क की भी है,ये अज़ब तासीर,
नशा न करके, नशा हो चुका !!
 ------2---
तेरी नफ़रतें अब मुझे रास आने लगी हैं,
दूर भी रहे ,तेरी हसरतें पास आने लगी है!!
तेरी शि्कायतों से आज भी आज़िज़ नही,
कुछ बेवज़ह, मगर कुछ खास आने लगीहै!!
-------3----
है तमन्ना तुम्हें निहारते यह ज़िन्दगी गुज़ार दूं,
जो तुम्हे कोई न दे सका, मैं तुम्हे वो प्यार दूं!
सच्चाईयों से इस ज़िन्दगी की ,नावाकिफ़ है तू,
प्यार का बुखार जो चढा है तुझॆ, उसे उतार दूं!!
आज इशक  भी सरे आम नीलाम हो रहा है ,
जो दाम नही हो खरीदने को, तो मैं उधार दू !!
नौजवानों से क्या पूछते हो प्यार का फ़ल्सफ़ा,
जो कोई ना हो सके तेरा,फ़िर भी उसे प्यार दू!!

-------4 ----
फ़िज़ा पर असर हवाओं का होता है .
मोहब्बत पर असर अदाओं का होता है!
कोई ऐसे ही किसी का दीवाना नही होता,
कुछ कुसूर तो निगाहो का होता है !!

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तेरे प्यार ने ऐसा ढाया कहर,
याद करता हूं शाम-ओ-सहर!!
इन्तज़ार रहता हैतेरे दीदार का,
निगाहें ढूंढती हैं तुझे हर प्रहर!!

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बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिक्न्दरा आगरा २८२००७
९४१२४४३०९३




Monday, August 26, 2013

मेरा छोटा सा

मेरा छोटा सा प्यारा सा लाला,
मेरा गोविन्दा श्याम  गोपाला !!
बॄज मण्डल मे बाजे -बधाई,
इसकी प्यारी छवि सबको भाई,
नाचे बॄज के गोपी औ ग्वाला !!मेरा गोविन्दा....
जसुमति का है ये तो कन्हाई,
इसको नज़र किसी ने लगाई,
कर डारूंगी उसका मुँह काला !!मेरा गोविन्दा......
नन्द बाबा का है ये खिलोना,
मेरा छौना है सबसे सलोना,
बडे नाज़ों से इसको है पाला !!मेरा गोविन्दा.....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Wednesday, August 7, 2013

वो

तुम्हे यह हक किसने दिया?जब चाहा
किसी की ज़िन्दगी मे चुपके से चली आओ!
ज़िन्दगी के किसी भी स्टेशन पर उतर जाओ,
पहले लुभाओ जी भर कर!
फ़िर प्यार परवान चढ्ने से पहले ही रुलाओ!!

     २  
है यही हसरत मेरी,तुझे इस कदर मज़बूर कर दूं,
मेरे ख्यालों मे खोई रहे,ज़माने से तुझे दूर कर दूं !!
क्योंकि तू ने ही कर दी, अब यही हालत मेरी ,
सोते-जागते सोचता हूं ,कि इस परी को हूर कर दूं!!

      ३
हर शाम सुहानी होती है,जब उसे बुलाता हू,
और वो झट से दौडी चली आती है !
दिल धक-धक करने लगता है ,
जब वो नैनो के बाण चलाती है !!
आँचल सरका पलकों को झपकाती है,
कसम खुदा की तन-मन मे आग लगाती है!!
कारे -कज़रारे नैनो से करे इशारे जो,
रिषी-मुनियों की तपस्या भँग कर जाती है !!

Saturday, July 6, 2013

तुम जितना नाराज़ रहोगी

तुम जितना नाराज़ रहोगी,
 उतना मेरे पास रहोगी !
हर पल याद सतायेगी,
मुझको नीद न आयेगी,
दूर तडप का अह्सास करोगी!!तुम जितना नाराज़ रहोगी
छू लेने का मन होगा,
पास न ये तन होगा ,
फ़िर मिलने की आस करोगी!!तुम जितना नाराज़ रहोगी
मीठी हवा का झोंका,
सखी-सहेली का टोका,
दर्द दिया मुझे विश्वास करोगी!!तुम जितना नाराज़ रहोगी,

Thursday, May 23, 2013

तुम चाहतों का समन्दर


तुम चाहतों का समन्दर सजाते रहे
हम बिला वजह ये आँसू बहाते रहे !
खामोश हो गई पत्थरों से टकराहट,
बनाकर घरोंदे रेत के हम मिटाते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर
सैलाब समन्दर मे कब शान्त है?
उसी मे मदहोश हम गोते लगाते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर
पर याद रखना तुम भी ये सदा,
ना रहेगी जवानी,जो तुम इतराते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर
हम तो शैदाई है तेरे ज़ल्वे के बस,
दिखा के जिसे तुम यूँ कतराते रहे!!तुम चाहतों का समन्दर

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
म चाहतों

Friday, April 5, 2013

दर्द के सैलाब


दर्द के सैलाब को कैसे रोक दूं,?
सर्द के प्रेमालाप कैसे रोक दूं ?
मै महज़ एक आम इन्सान हूँ -
देव के अभिशाप कैसे रोक दूं?
दर्द के सैलाब को कैसे रोक लूं,?
तुम चाहो अभिसार कम करो,
पर निज पाप को कैसे रोक दूं ?
दर्द के सैलाब को कैसे रोक लूं,?
प्यार वासना का ही प्रारब्ध है
वासना के श्राप को कैसे रोक दूं?
दर्द के सैलाब को कैसे रोक दूं ?
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Thursday, March 28, 2013

कितनी हसरतों....


कितनी हसरतों से तुझे प्यार था किया,
पुराना घाव कितने मुश्किल से था सिया!
पर अब तलक है इन्त्ज़ार उस लम्हे का,
कब कहोगी प्यार से मुझको अपना पिया? कितनी हसरतों....
आँखो मे शरारत है,चाल मे है नफ़ासत,
पाँव रखते हो ज़मी पे, हिल जाये जिया!
कब तलक तडपाओगे, अपनी बेरुखी से?
हो न यह शिकवा ,एक दर्द तुमने है दिया! कितनी हसरतों....
है यही हुस्न की दास्ताँ ,हर मुहब्बत की,
जब तक चाहा लुभाया,अलविदा कर लिया!
तुम ना करना ऐसा सनम इस प्यार मे,
वर्ना हो जायेगा ज़ुदा,इस ज़िस्म से जिया!!कितनी हसरतों....

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा २८२००७

Monday, March 25, 2013

कैसे खेलूं फ़ाग सखी री


कैसे खेलूं फ़ाग सखी री, कैसे खेलूं फ़ाग ?
मेवा-मावा सब मे लग रही कैसी  आग!!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री..कैसे खेलूं फ़ाग ?
पानी नाही जमनाजी मे,फ़ेंक रही है झाग,!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री..कैसे खेलूं फ़ाग ?.
नाते-रिश्ते भुलाय गये,ऐसी लग रही आग!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री.कैसे खेलूं फ़ाग ?.
होय गई अटरिया इत्ती ऊँची,बोले नाही काग!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री, कैसे खेलूं फ़ाग ?
नफ़रत इती बढ गई,नाय रह्यो प्रेम को राग!!.
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री, कैसे खेलूं फ़ाग ?
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Tuesday, February 19, 2013

बनकर दासी तुम्हारी


बनकर दासी तुम्हारी, मैने हर अत्याचार सहे !
खुशी तुम्हारी थी मेरी, कभी न एक बार कहे !!
कहते थे मुझको जीवन-साथी,साथ नही निभाया!
मेरा प्रतिरूप तुम्हीने,औरों के कहने पर गिरवाया!
अपनी बीमारी पर भी,हर रात व्याभिचार सहे,
पुरुषों का समाज , इनकी करनी कौन कहे ?बनकर दासी तुम्हारी..
घर की मै प्राण प्रिये,बाहर इनका अम्बार प्रिये!
घर हो या बाहर, कौन करे इनका एत्बार प्रिये!
एक नई कोंपल के लिये,मैने कितने दर्द सहे,
तुमने कितने ज़ुल्म किये,घरवालों से नही कहे!!बनकर दासी तुम्हारी...

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Tuesday, February 12, 2013

कुछ बातें पन्नो पर


कुछ बातें पन्नो पर ,कुछ दिल मे लिख दीं,
पन्नों पर दिखती है,दिल की नही दिख दी!!
लाऊं कहाँ से इतनी इबारत कि पैगाम लिखूं?
जितनी लिख पाया,बाकी संजो के रख दी!! कुछ बातें पन्नो पर ..
पल दो पल का साथ नही,वो बरसों का था,
लिख-लिख कर जो छूटा,दिल पर लिख दी!!कुछ बातें पन्नो पर...
कोई कहे शायर मुझको, कोई कहे दीवाना ,
यार पढे या फ़ाडे, मनमे जो आया लिख दी!!कुछ बातें पन्नो पर..

बोधिसत्व कस्तूरिया२०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Sunday, February 10, 2013

वैलैन्टाइन


भूल गये अपनी संस्क्रति,
भूल गये  तीज़-त्यौहार !
गले लगा लिया वैलैन्टाइन,
भूल गये "बसंत-बहार !!
कामदेव की करो आराधना,
फ़िर करो प्रेम इज़हार !
क्यूँ "वैलैन्टाइन" मनायें?
नही अग्रेज़ी के पहरेदार!!भूल गये अपनी ......
सरसों फ़ूली है बासन्ती,
भ्रमर करते है गुन्जार !
अपनी-अपनी होती है,
दूजे की क्यों करे गुलजार!!भूल गये अपनी ...
है वही तिथि वोही माह,
फ़िर काहेका तिरस्कार !
मन मयूर जब नर्तन करे,
छोटे-बडे करो सभी को प्यार!!भूल गये अपनी.....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७