Tuesday, September 30, 2014

मशविरा

कभी किसी और से उसकी बातें न कर,
वो भी कही उसका दीवाना ना हो जाये!
है इश्क वो हसरत ,जिसको छुपाने से,
मिठास ऐसी, दिनो-दिन बढती ही जाये !!
गर कर दिया एलान,उसका सारे जहाँ,
खुद तो मरोगे और वो रुसवा हो जाये !!

है इश्क वो आतिश गालिब जो जलाये,
वो जले ही,औरो का बेडा गर्क हो जाये !!
है मशविरा मेरा यह ,इश्क के परिन्दों से,
ज़ल्द अपनाले उसे,कहीं फ़ुर्र न हो जाये !!
बोधिह्सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Thursday, September 4, 2014

शिछक दिवस

विद्या-मन्दिर अच्छा खासा बाज़ार हो गया,
प्रमाण-पत्र क्रय-विक्रय का व्यौपार हो गया !
गाँव-गाँव मे पढे-लिखों का अम्बार हो गया,
विद्या-मन्दिर अच्छा खासा बाज़ार हो गया !!

शिछक कितना,      अब लाचार हो गया ?
पुत्र उसी का ,अब गुण्डों का सरदार हो गया,
कछा मे आ जाके , तो आभार   हो गया !
विद्या-मन्दिर अच्छा खासा बाज़ार हो गया !!

विषय-बोझ से लदा शिष्य, बीमार हो गया,
नित-नूतन पाठ्य-क्रम,कुतुब मीनार हो गया !
शिछा-नीति बदलना,  एक त्यौहार हो गया,
विद्या-मन्दिर अच्छा खासा  बाज़ार हो गया !!

राजनीति से  सरस्वती को प्यार हो गया,
उसके वीणा का सुर, अब नाकार हो गया !
शिछक पिटना, दैनिक समाचार हो गया,
विद्या-मन्दिर अच्छा खासा बाज़ार हो गया  !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दर आगरा २८२००७

Wednesday, September 3, 2014

संस्कॄति के समन्दर से

संस्कॄति के समन्दर से, सभ्यता का सुर गूंजता है,
समॄद्ध नही है जो, वह इसी के गर्भ मे डूबता है !!
इसके शोर मे भी अलख एक अपने अतीत की है,
जिस पर चिर स्थाई सॄजन फ़िर फ़िर सूझता है !!
नित नई लहरें नये सॄजन की द्स्तक दे रही है,
पुरातन के नित टूटने का भ्रम हर कोई बूझता है!!
सॄष्टि के इस नियम मे बाधक हम क्योंकर बनें,
समॄद्ध है वही संस्कृति जिसमे सृजन ही सूझता है!!
हमारी संस्कॄति के समुद्र-मन्थन की है परिणति,
कि विश्व आज भी हिदू,बौद्ध,जैन धर्म को पूजता है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Monday, September 1, 2014

हर किसी से कभी दिल की बात नही कहना,

हर किसी से कभी दिल की बात नही कहना,
गर कोई बदनियत हो जाय,ज़ुल्म मत सहना !!हर किसी से कभी दिल 
है मशविरा उन सभी ना समझ बच्चियों को ,
प्यार के झूठे भुलावे मे ,न कभी यों ही बहना !!हर किसी से कभी दिल 
खुद बखुद आप गौर इस बात पर तो कीजिये,
क्यो इस कदर महरबान, दे रहा उपहार-गहना !!हर किसी से कभी दिल 
हर किसी को शक की निगाह से मत देखिये,
पर हर निगाह को भी, मत समझना अपना !!हर किसी से कभी दिल 
ज़ुल्म की हर इबारत, बर्दाश्त से शुरू होती है,
मोहब्बत के फ़रेब को,हमेशा तौबा ही कहना !!हर किसी से कभी दिल 

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७