Thursday, March 28, 2013

कितनी हसरतों....


कितनी हसरतों से तुझे प्यार था किया,
पुराना घाव कितने मुश्किल से था सिया!
पर अब तलक है इन्त्ज़ार उस लम्हे का,
कब कहोगी प्यार से मुझको अपना पिया? कितनी हसरतों....
आँखो मे शरारत है,चाल मे है नफ़ासत,
पाँव रखते हो ज़मी पे, हिल जाये जिया!
कब तलक तडपाओगे, अपनी बेरुखी से?
हो न यह शिकवा ,एक दर्द तुमने है दिया! कितनी हसरतों....
है यही हुस्न की दास्ताँ ,हर मुहब्बत की,
जब तक चाहा लुभाया,अलविदा कर लिया!
तुम ना करना ऐसा सनम इस प्यार मे,
वर्ना हो जायेगा ज़ुदा,इस ज़िस्म से जिया!!कितनी हसरतों....

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा २८२००७

Monday, March 25, 2013

कैसे खेलूं फ़ाग सखी री


कैसे खेलूं फ़ाग सखी री, कैसे खेलूं फ़ाग ?
मेवा-मावा सब मे लग रही कैसी  आग!!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री..कैसे खेलूं फ़ाग ?
पानी नाही जमनाजी मे,फ़ेंक रही है झाग,!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री..कैसे खेलूं फ़ाग ?.
नाते-रिश्ते भुलाय गये,ऐसी लग रही आग!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री.कैसे खेलूं फ़ाग ?.
होय गई अटरिया इत्ती ऊँची,बोले नाही काग!!
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री, कैसे खेलूं फ़ाग ?
नफ़रत इती बढ गई,नाय रह्यो प्रेम को राग!!.
कैसे खेलूं फ़ाग सखी री, कैसे खेलूं फ़ाग ?
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७