<कल याद तुम्हारी आई ,बचपन के सारे वरक पलट डाले !
उफ़ वोह निगाहे नाज़ की दावत ,कोइ बाँहों में मसल डाले !!कल याद.....
पलकों को उठाना और झुका के सिजदे करना !
आँख मिली और,चूनर के कोने ही कुतर डाले !! कल याद.......
हर रोज़ तुम्हारी इस हरकत ने चाहत का ऐलान किया!
याद नहीं कब हमने ,बचपन के तेवर ही बदल डाले!! कल याद.....
अपने इश्क के चर्चे ,कुछ इस तरह से मशहूर हुए !
राहे मुहब्बत में उठने से पहले ,पों तुम्हारे जंजीरों ने जकड डाले!!कल याद...
मजहबी मक्कारों ने ,हम तुमको जुदा कर डाला!
या रब कोइ भूले से भी इन पेय ना कफ़न डाले!! कल .......... बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा agra 282007
Saturday, January 12, 2008
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