Friday, November 30, 2007

ताज महल


मेरी हसरत थी कि मेरे ज़हन के हर दरीचे से ताज महल नज़र आये !

जिसमे हो धूप की तपिश , पर चांदनी की नम ओस से नहाये !! मेरी हसरत थी कि.........

क्यूंकि इसमे मोहब्बत और इश्क की दास्तान बाबस्ता है !

पर आज तो इस शहर में पानी महंगा और खून सस्ता है !! मेरी हसरत थी कि....

अब तो हद हो चुकी सनम ,ताज पर भी आतंकी साये हैं !

बड़ी हसरत से दीदार को आये थे ,यहाँ भी पुलिस और मेटल डिटेक्टर छाये हैं !! मेरी हसरत थी कि......

अमन चैन कहाँ खो गया ?ढूँढता फिरता है शायर -


समझ नहीं आता आदमी बहादुर है या कि फिर हो गया कायर? मेरी हसरत थी कि.....

बोधिसत्व कस्तूरिया

Monday, November 5, 2007

sheetalta


छाया हो वृक्षों की,

मेघों की, या फिर

काले घने केशों की-

शीतलता देती है प्रथक-प्रथक !

सुर लहरी हो,

कोयल की,

रिमझिम की, या फिर

विरह गीतों की-

तृप्ती देती है प्रथक-प्रथक !

जलधारा हो-

झरने की,

वर्षा की या फिर

प्रेयसी के नेनों की -

आकर्षण देती है प्रथक-प्रथक !! बोधिसत्व कस्तूरिया







Sunday, November 4, 2007

untardwand



मेरे अंतस का अंतर्द्वंद,


उस अंकुर का

जो प्रस्फुटित होना चाहता है !

उसे पा लूं ,

गले से लगा लूं,या

नोच कर मिटा दूं,

जो प्रतिष्ठित होना चाहता है !
दोषी कौन है?

मृतप्राय माली ,

शुष्क धरती,या

वह कुंठित बीज

जो अंकुरित होना चाहता है !

इनके अतरिक्त भी कोई और है

हाँ संभवतः पर्यावरण,

जो प्रतिबिम्बित होना चाहता है !! बोधिसत्व कस्तूरिया