
छाया हो वृक्षों की,
मेघों की, या फिर
काले घने केशों की-
शीतलता देती है प्रथक-प्रथक !
सुर लहरी हो,
कोयल की,
रिमझिम की, या फिर
विरह गीतों की-
तृप्ती देती है प्रथक-प्रथक !
जलधारा हो-
झरने की,
वर्षा की या फिर
प्रेयसी के नेनों की -
आकर्षण देती है प्रथक-प्रथक !! बोधिसत्व कस्तूरिया

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