Monday, November 5, 2007

sheetalta


छाया हो वृक्षों की,

मेघों की, या फिर

काले घने केशों की-

शीतलता देती है प्रथक-प्रथक !

सुर लहरी हो,

कोयल की,

रिमझिम की, या फिर

विरह गीतों की-

तृप्ती देती है प्रथक-प्रथक !

जलधारा हो-

झरने की,

वर्षा की या फिर

प्रेयसी के नेनों की -

आकर्षण देती है प्रथक-प्रथक !! बोधिसत्व कस्तूरिया







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