Friday, November 30, 2007

ताज महल


मेरी हसरत थी कि मेरे ज़हन के हर दरीचे से ताज महल नज़र आये !

जिसमे हो धूप की तपिश , पर चांदनी की नम ओस से नहाये !! मेरी हसरत थी कि.........

क्यूंकि इसमे मोहब्बत और इश्क की दास्तान बाबस्ता है !

पर आज तो इस शहर में पानी महंगा और खून सस्ता है !! मेरी हसरत थी कि....

अब तो हद हो चुकी सनम ,ताज पर भी आतंकी साये हैं !

बड़ी हसरत से दीदार को आये थे ,यहाँ भी पुलिस और मेटल डिटेक्टर छाये हैं !! मेरी हसरत थी कि......

अमन चैन कहाँ खो गया ?ढूँढता फिरता है शायर -


समझ नहीं आता आदमी बहादुर है या कि फिर हो गया कायर? मेरी हसरत थी कि.....

बोधिसत्व कस्तूरिया

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