Tuesday, February 10, 2009

मैं और तुम


मैं वेणी बन सकता हूँ ,यदि तुम अपने केश सजाओ !
मैं कर्ण फूल बन सकता हूँ,जो तुम अपने गाल सजाओ !!
मैं इंगुर बन सकता हूँ , जो तुम अपनी मांग रचाओ !
मैं बेंदी बन जाऊं, जो तुम अपने भाल सजाओ !!मैं वेणी बन सकता हूँ ......
मैं काजल सा काला बन जाऊं,जो तुम अपने नैन बसाओ!
मैं हार गले का बन जाऊं,जो तुम अपने सीने मुझे लगाओ !!मैं वेणी बन सकता हूँ......
प्रीतम मैं तेरा कहलाऊँ ,जो तुम अपने हृदय बसाओ !!
मैं वेणी बन सकता हूँ, जो तुम अपने केश सजाओ !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा २८२००७

Wednesday, February 4, 2009

खुशी/गम

मुझे हर खुशी में एक गम मिला है !
क्या येही जिंदगी का सिलसिला है ?
हर किसी को कुछ नई की फिराक है !
फ़िर भी पुरानो को छोड़ने का गिला है !!मुझे हर खुशी .......
अपनी दुख्तर को जो रुखसत किया ,
आँखे थी नम ,पर चेहरा खुशी से खिला है !!मुझे हर खुशी .....
उसको भी नया पाने की आस में ही,
पुरानो को छोड़, नयों से बहुत मिला है !!मुझे हर खुशी .......
गैरों से मिले दर्द को सह लेता हूँ,
पर उसका क्या करू जो अपनों से मिला है !!मुझे हर खुशी ......
जब- जब बजी कहीं शहनाई ,
कोई खुश हो लेकिन,मेरा तो दिल जला है !!
मुझे हर खुशी में एक गम मिला है ,
क्या येही ज़िन्दगी का सिलसिला है !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007