Tuesday, October 5, 2010

खुदाई

आ गया दिल जब,

फ़िर रुसवाई से क्या मतलब?

जब साथ हो तुम्हारा,

फ़िर तन्हाई से क्या मतलब?

जब सब तरफ़ हो ज़लज़ला,

फ़िर निराई से क्या मतलब?

तिल मे तेल ही न हो,

फ़िर पिराई से क्या मतलब?

दिल ही न जब मिलें,

फ़िर सगाई से क्या मतलब?

सनम को जो माना खुदा,

फ़िर खुदाई से क्या मतलब ?

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Tuesday, August 31, 2010

JANMASHTAMEE

क्रिष्ण पछ भादों , की वो थी रात अंधेरी,

कंस -अंत की जब बज उठी रण-भेरी !

कन्हाई ने जब मा-देवकी की थी पीड हरी,

उनके मुख से निकल पडा"जय -हरी ,हरी!

बन्दी-ग्रह मथुरा के खुल गये सारे ताले,

मारेगा उसको क्या?जो सारी दुनिया पाले!

सो गये सारे रक्छ्क भोर भये तक,

बासुदेव ले चले उन्हे नंद-गांव तक !

जमुनाजी कर रही थीं ता-ता थेया ,

आ गये ब्रज मे किशन- कन्हैय्या !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

Friday, August 27, 2010

meree rachanaaye

मे्री रचनायें


मेरी रचनायें ,मे्री कविता नही मेरा जुनून है,

सामाजिक विषमताओं पर उबलता मेरा खून है!!

लेखनी के बाण कभी किसी को भेदते हैं,

कभी किसी को आह्लादित-किसी को छेदते हैं!! मेरी रचनायें........

मै सामाज़िक सौहाद्र,समन्वय पर लिखता नही,

जीवन असत्य है,लोगो को सत्य दिखता नही !! मेरी रचनायें.....

प्रेम की जिन्हे परिभाषा आती नही प्रेम पर लिखते हैं,

वासना को प्रेम से परोसते हैं,तभी ऊंचे फ़्रेम् पर दिखते हैं!! मेरी रचनायें....

पाप-पुण्य की परिभाषा नये संदर्भों मे बदल गई है,

स्वार्थ-परता,आज़ के सुख के सांचे मे ढल गई है !! मेरी रचनाये......

सत्य लिखने पर भी कहां मिलता सुकून है?

मेरी रचनाये, मेरी कविता नही मेरा जुनून है!! मेरी रचनाये....

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Thursday, August 26, 2010

rakhee 2010

राखी२०१०


पड रही कैसी रिमझिम बुंदिया फ़ुहार?

तन मे लागे आग मन मे जागे ज्वार !

झूले पड गये,पर ना झूले मनवा हमार,

कैसे मनाऊं अबकी राखी को त्योहार ? पड रही.......

सावन लागे भारी इबकी बार ,

जबरन जमीन लै रही ,जे ज़ालिम सरकार !

मै मैके नही जाऊंगी इबकी बार,

लैके रहूंगी अपनौ समपत्ती कौ अधिकार ! पड रही.......

इत सारे देस मा बाढ भरे हुंकार,

जामै डूब गयो खेत-खलिहान औ सारो संसार !

कैसे जाऊं मैके हो गयो बंटा धार,

मैके औ सासरे दोऊ की कैसे होवे नैया पार !

पड रही कैसी रिमझिम बुंदिया फ़ुहार !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Saturday, August 14, 2010

15 agast 2010

स्वतन्त्रता के अमर शहीदों को सलाम,
तिरसठ वर्षों की बेबाक आज़ादी को प्रणाम!!
आज उनके ज़ज़्बे से हम आज़ाद हैं,
उनकी वतन परस्ती को गाते यह कलाम!! स्वतन्त्रता के........
कभी उनकी शहादत सुनकर रूह कांपती,
आज़ उनकी रूह से रूबरू होने का है काम!! स्वतन्त्रता के........
१८५७ से हो गई शुरू जंग-ए-आज़ादी ,
लक्ष्मी बाई,तात्या टोपे की हसरत का है नाम!! स्वतन्त्रता के....
चन्द्र शेखर,सुभाष,भगत सिंह राज गुरू,
हैं ऎसे अनेकों अनगिनत शहीदों का ये काम!! स्वतन्त्रता के.......
तीर-तलवार, हिन्द- सेना के साथ लेखनी ,
इकबाल- बिस्मिल शायरी ज़िसका था नाम !! स्वतन्त्रता के .....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २९२००७

Tuesday, June 8, 2010

पर्यावरण

पर्यावरण
कभी "सूनामी",कभी"लैला",तो कभी"फ़ैट" है !
पता नही प्रक्रति के गर्भ मे कब,कहां कया सैट है ?
प्रक्रति से प्रहसन,अब कितना महगा पड रहा?
ग्लोबल वार्मिंग से समपूर्ण विश्व कैसे सड रहा?
पेड-पौधे काट ,सडक और भवन बन रहे !
खेत -खलिहान खत्म ,बहु-मन्ज़िले तन रहे!!
अन्न-जल की अब ,समस्या बहुत गम्भीर होगी !
प्रक्रति से दूर होते ही,काया हो गई है कितनी रोगी?
ओज़ोन मे भी अब तो बडा छेद हो चुका है !
प्रक्रति को रौद मानव,स्वयंभू देव हो चुका है!!
आलम यही गर रहा ,तो विश्व का विनाश सन्निकट है!
परमाणु-युद्धका भय नही,पर पर्यावरण समस्या विकट है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Sunday, May 9, 2010

माँ की ममता

मां की ममता
कोई नही समता!
धैर्य की प्रबल छमता
स्नेह आवेग नही थमता!
इतिश्री है प्यार की,
सीमा नही दुलार की!
उसके ज़िगर का टुकडा,
नही समझता उसका दुखडा!
वो समन्दर है प्यार की,
समा जाती है नदिया दुलार की!
उसके प्यार का नही पारावार,
उसकी झिड्की मे ही तेरा उद्धार!
बोधिसत्व कस्तूरिया२०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Saturday, March 13, 2010

दर्द


मेरे दर्द से किसी को गिला नही,
कोई दर्द बांट्ने वाला मिला नही!!
जिसे कभी चाहा वो तो मिला नही,
येही दर्द हैजिसका कोई सिलसिला नही!!
काश वो होते मेरी शरीके-हयात,
दर्द होने पर भी कह्ते कि -कोई मिला नही!!
जिसे चाहने की हसरत दिल मे दबी है,
उससे भी कोई शिकवा और गिला नही !!
मेरे रब् को था येही मन्ज़ूर,
सबको बांट्कर भी मेरे लिये वो हिला नही!!
हर किसी की चाहत उसे नसीब नही,
इसीलिये -उससे भी मुझे कोई गिला नही!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा -२८२००७
मो:०९४१२४४३०९३

Thursday, March 11, 2010


एक बार भरी पिचकारी,
उसने जो मोपे मारी,
मै भीज़ गई थी सारी-
पहले तो मैने उसे दी गारी!
जब उसकी आई बारी,
उसने दी मीठी हुँकारी-
मै हो गई बलिहारी !!एक बार........
जब आई मिलन कि बारी,
मै काँप रही थी भारी,
फ़िर हो गया मिलना जारी-
आज तलक हूँ उनकी प्यारी! एक बार......
बोधिसत्व क्स्तूरिया २०२ नीरव निकुँज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Wednesday, March 10, 2010

मानव मूल्य


हूँ व्योपारी, पर मानव मूल्यों का व्योपार नहीं करता !

जब लेखनी हाथ उठा लूं ,फिर नहीं किसी से डरता !!

राम,श्रवन की बातें, अब केवल इतिहास हो गईं !

मानव मूल्यों का परिवर्तन ,केवल प्रयास हो गईं !!

मात-पिता हेतु कांवेर नहीं ,मीठा संबोधन काफी है !

पितृ आदेश हेतु बनवास नहीं ,अपनापन ही काफी है !!

भरत सम भाई नहीं बन सकते ,सहोदर बनकर देखो !

मानव मूल्यों पर अमल करो,दूजे को खुशियाँ देकर देखो !!

घर-परिवार,समाज , सब तुम पर गर्व करेंगे !

राष्ट्र- धरोहर हो तुम, भारतीय समाजको धन्य करेंगे!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

एकाकी सब सून


कागज़ ,कलम, और दवात, एकाकी सब सून !

लड़का ,लड़की ,और बरात,एकाकी सब सून !!

तम्बू, कुर्सी, और कनात, एकाकी सब सून !

ईटा, गारा, और परात , एकाकी सब सून !!