
एक बार भरी पिचकारी,
उसने जो मोपे मारी,
मै भीज़ गई थी सारी-
पहले तो मैने उसे दी गारी!
जब उसकी आई बारी,
उसने दी मीठी हुँकारी-
मै हो गई बलिहारी !!एक बार........
जब आई मिलन कि बारी,
मै काँप रही थी भारी,
फ़िर हो गया मिलना जारी-
आज तलक हूँ उनकी प्यारी! एक बार......
बोधिसत्व क्स्तूरिया २०२ नीरव निकुँज सिकन्दरा आगरा २८२००७
उसने जो मोपे मारी,
मै भीज़ गई थी सारी-
पहले तो मैने उसे दी गारी!
जब उसकी आई बारी,
उसने दी मीठी हुँकारी-
मै हो गई बलिहारी !!एक बार........
जब आई मिलन कि बारी,
मै काँप रही थी भारी,
फ़िर हो गया मिलना जारी-
आज तलक हूँ उनकी प्यारी! एक बार......
बोधिसत्व क्स्तूरिया २०२ नीरव निकुँज सिकन्दरा आगरा २८२००७

No comments:
Post a Comment