Wednesday, March 10, 2010

मानव मूल्य


हूँ व्योपारी, पर मानव मूल्यों का व्योपार नहीं करता !

जब लेखनी हाथ उठा लूं ,फिर नहीं किसी से डरता !!

राम,श्रवन की बातें, अब केवल इतिहास हो गईं !

मानव मूल्यों का परिवर्तन ,केवल प्रयास हो गईं !!

मात-पिता हेतु कांवेर नहीं ,मीठा संबोधन काफी है !

पितृ आदेश हेतु बनवास नहीं ,अपनापन ही काफी है !!

भरत सम भाई नहीं बन सकते ,सहोदर बनकर देखो !

मानव मूल्यों पर अमल करो,दूजे को खुशियाँ देकर देखो !!

घर-परिवार,समाज , सब तुम पर गर्व करेंगे !

राष्ट्र- धरोहर हो तुम, भारतीय समाजको धन्य करेंगे!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

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