
हूँ व्योपारी, पर मानव मूल्यों का व्योपार नहीं करता !
जब लेखनी हाथ उठा लूं ,फिर नहीं किसी से डरता !!
राम,श्रवन की बातें, अब केवल इतिहास हो गईं !
मानव मूल्यों का परिवर्तन ,केवल प्रयास हो गईं !!
मात-पिता हेतु कांवेर नहीं ,मीठा संबोधन काफी है !
पितृ आदेश हेतु बनवास नहीं ,अपनापन ही काफी है !!
भरत सम भाई नहीं बन सकते ,सहोदर बनकर देखो !
मानव मूल्यों पर अमल करो,दूजे को खुशियाँ देकर देखो !!
घर-परिवार,समाज , सब तुम पर गर्व करेंगे !
राष्ट्र- धरोहर हो तुम, भारतीय समाजको धन्य करेंगे!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

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