एक चीख
में पीपल का पुराना पेड़
प्रतिवर्ष पीत परिधानों
को पलटते पलटते ,
प्रियदर्शनी प्रेयसीयों को प्यारा हो गया !
परिक्रमा कर प्रज्वलित करती हैं दीपक,
क्योंकि उन्हें मेरे ऊपर,
ब्रह्मवास का वहम हो गया !!
परन्तु कोई नहीं सुनता ,
मेरे ब्रह्म की चीख-
"पुण्य प्राप्ती के पागलो !
पलायन करो,पीछा छोडो ,क्योंकि-
में अब भीतर से खोखला हो गया!! बोधिसत्व कस्तूरिया
Tuesday, October 30, 2007
Sunday, October 21, 2007
yauvan
यौवन के दिन कुछ ऐसे बीते,जैसे कुम्भ धरे हों रीते !
कुछ करने कि उत्कंठा ,कुछ पाने कि अभिलाषा!
समझ नहीं आती जीवन कि परिभाषा !!
समय फटे-चीथड़े सीते, यौवन के दिन................. !
युवा-शक्ति दिग-भ्रमित भटकती,
माँ-बापों के आँख खटकती!
शिक्षक के है गले अटकती !
सेवा - योज़न पर पैर पटकती,
जीवन-धारा सूख न जाये आँसू पीते ,यौवन के दिन ...............!
अपराधों की बाढ़ जो आये ,
कोई इन्हें न दोष लगाए !
दिशा दिखाने कोई तो आये !!
और इन्हें फिर गले लगाए !
टूट गए हैं आशाओं के फीते, यौवन के दिन.................!
बोधि सत्व कस्तूरिया
कुछ करने कि उत्कंठा ,कुछ पाने कि अभिलाषा!
समझ नहीं आती जीवन कि परिभाषा !!
समय फटे-चीथड़े सीते, यौवन के दिन................. !
युवा-शक्ति दिग-भ्रमित भटकती,
माँ-बापों के आँख खटकती!
शिक्षक के है गले अटकती !
सेवा - योज़न पर पैर पटकती,
जीवन-धारा सूख न जाये आँसू पीते ,यौवन के दिन ...............!
अपराधों की बाढ़ जो आये ,
कोई इन्हें न दोष लगाए !
दिशा दिखाने कोई तो आये !!
और इन्हें फिर गले लगाए !
टूट गए हैं आशाओं के फीते, यौवन के दिन.................!
बोधि सत्व कस्तूरिया
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