Sunday, October 21, 2007

yauvan

यौवन के दिन कुछ ऐसे बीते,जैसे कुम्भ धरे हों रीते !
कुछ करने कि उत्कंठा ,कुछ पाने कि अभिलाषा!
समझ नहीं आती जीवन कि परिभाषा !!
समय फटे-चीथड़े सीते, यौवन के दिन................. !
युवा-शक्ति दिग-भ्रमित भटकती,
माँ-बापों के आँख खटकती!
शिक्षक के है गले अटकती !
सेवा - योज़न पर पैर पटकती,
जीवन-धारा सूख न जाये आँसू पीते ,यौवन के दिन ...............!
अपराधों की बाढ़ जो आये ,
कोई इन्हें न दोष लगाए !
दिशा दिखाने कोई तो आये !!
और इन्हें फिर गले लगाए !
टूट गए हैं आशाओं के फीते, यौवन के दिन.................!

बोधि सत्व कस्तूरिया

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