Friday, March 27, 2015

"भारत रत्न अटल"

सादगी और संस्कृति के उपासक सरल,
नाम उनका है वाजपेई बिहारी  अटल!!
कवि-हृदय,मॄदु-भाषी,हास्य के पर्याय है,
विद्वेष-ईर्षा से परे,है नितान्त निश्छल!!
साहित्य और संस्कृति के दृढ-प्रणेता,
त्यागी-तपस्वी सा जीवन है अविरल!!
कामना से परे,भावना से भरे ओजस्वी,
हिन्द के युग-पुरुष है"भारत रत्न अटल"!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज,सिकन्दरा,आगरा २८२००७

Saturday, March 21, 2015

गाँव

कैसे बदले बदले गाँव ?
नही मिल रही है छाँव !
बद्ध-बैल गायब है सब,
ट्रैक्टर-ट्राली पसारें पाँव!!
मेल-मुहब्बत नही मिले,
इक-दूजे पर मारें दाँव!!
हर आँगन मे दीवारें है,
कऊए सी कर रहे काँव!!
साडी-बिलोज़ न दीखें,
जीन्स-टाप की है छाँव!!
लल्ला चले गये लन्डन,
खँडहर ह्वे गये हैं गाँव!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा ,आगरा २८२००७

Monday, March 16, 2015

होली का त्यौहार

हर किसी के ज़हन मे इश्क सवार है
है ये बदहवासी या होली का बुखार है?
हर कोई अपने ही रंग मे सराबोर है,
हर किसी को अपनी का इन्त्ज़ार है!!
ना बोलियों का ,ना मज़हब का बैर,
इतनी मुहब्ब्त कि मौला भी बेज़ार है!!
कया इसी दिन के लिये पूरे साल,
दंगे-फ़साद करते है,?येकैसा प्यार है!!
सब मिलके नाचो-गाओ एक साथ,
कि आया फ़िर होली का त्यौहार है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

छल और छूठ

छल और छूठ है सत्ता के गलियारे मे,
फ़र्क नही कोई दुश्मन और प्यारे मे!
था जो भी  दुश्मन चुनाव से पहले,
फ़र्क नही है फ़िर जीते और हारे मे !!
सभी समीकरण फ़ेल होते देखे हमने,
पर वो भूल गये फ़िर क्या था नारे मे?
मन्दिर-मस्ज़िद का मुद्दा् या ३७० का,
कोरी हवा बाज़ी है जनता के बारे मे !!
पर "यह जनता है ,सब जानती है "
पर वो बिक गये केवल एक इशारे मे!!
छल और छूठ पर देश-भक्त बनते हैं,
है फ़र्क नही भाई चचेरे और मौसेरे मे!!
अपना पेट भरो, जनता को मरने दो,
वो मरी बाढ-सूखा औ नेताओं नारे मे!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

Sunday, March 15, 2015

"सबका साथ-सबका वि्कास"

गर गद्दार छुपे है सीमा पर ,
कमी नही है पहरेदारों की !
भून-भून के रख देगे छाती
हम मसरत के रखवारो की!!
वक्त गया छमा-याचना का,
आया तीर,तोप,तलवारों की!!
भूल गये सबक बाँग्ला देश,
और कारगिल के मारों की ?
"सबका साथ-सबका वि्कास"
मंत्र नही माटी के गद्दारों की!!
हम हाथ बढाये मित्रता का,
है नही ये कायर-बीमारों की!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

होली

श्याम के रंग मे जब रंग जावे राधा प्यारी,
तब समझो,अब सज गई रंगो की फ़ुलवारी!
हर ग्वाला है कान्हा,हर बाला बरसाने बारी,
सज-धज के ठाडे, वॄज मन्डल के नर-नारी!!
स्वप्न सजन के मन मे सजाये निकल पडे,
ढूँढ रहे कौन गली छिपीखडी है राधा हमारी!!
है सब चौकन्ने,ज्यों छिडी हुई है जंग पुरानी
कर डारें बेहाल, जो मिल जावे कॄष्ण मुरारी!!
आज भूल गये बरसन के सब वो बैर पुराने,
रंग लगाकर,भंग चढाकर बोले-जैहोय तिहारी!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दर आगरा २८२००७