श्याम के रंग मे जब रंग जावे राधा प्यारी,
तब समझो,अब सज गई रंगो की फ़ुलवारी!
हर ग्वाला है कान्हा,हर बाला बरसाने बारी,
सज-धज के ठाडे, वॄज मन्डल के नर-नारी!!
स्वप्न सजन के मन मे सजाये निकल पडे,
ढूँढ रहे कौन गली छिपीखडी है राधा हमारी!!
है सब चौकन्ने,ज्यों छिडी हुई है जंग पुरानी
कर डारें बेहाल, जो मिल जावे कॄष्ण मुरारी!!
आज भूल गये बरसन के सब वो बैर पुराने,
रंग लगाकर,भंग चढाकर बोले-जैहोय तिहारी!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दर आगरा २८२००७
तब समझो,अब सज गई रंगो की फ़ुलवारी!
हर ग्वाला है कान्हा,हर बाला बरसाने बारी,
सज-धज के ठाडे, वॄज मन्डल के नर-नारी!!
स्वप्न सजन के मन मे सजाये निकल पडे,
ढूँढ रहे कौन गली छिपीखडी है राधा हमारी!!
है सब चौकन्ने,ज्यों छिडी हुई है जंग पुरानी
कर डारें बेहाल, जो मिल जावे कॄष्ण मुरारी!!
आज भूल गये बरसन के सब वो बैर पुराने,
रंग लगाकर,भंग चढाकर बोले-जैहोय तिहारी!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दर आगरा २८२००७

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