क्रिष्ण पछ भादों , की वो थी रात अंधेरी,
कंस -अंत की जब बज उठी रण-भेरी !
कन्हाई ने जब मा-देवकी की थी पीड हरी,
उनके मुख से निकल पडा"जय -हरी ,हरी!
बन्दी-ग्रह मथुरा के खुल गये सारे ताले,
मारेगा उसको क्या?जो सारी दुनिया पाले!
सो गये सारे रक्छ्क भोर भये तक,
बासुदेव ले चले उन्हे नंद-गांव तक !
जमुनाजी कर रही थीं ता-ता थेया ,
आ गये ब्रज मे किशन- कन्हैय्या !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007


No comments:
Post a Comment