Tuesday, August 31, 2010

JANMASHTAMEE

क्रिष्ण पछ भादों , की वो थी रात अंधेरी,

कंस -अंत की जब बज उठी रण-भेरी !

कन्हाई ने जब मा-देवकी की थी पीड हरी,

उनके मुख से निकल पडा"जय -हरी ,हरी!

बन्दी-ग्रह मथुरा के खुल गये सारे ताले,

मारेगा उसको क्या?जो सारी दुनिया पाले!

सो गये सारे रक्छ्क भोर भये तक,

बासुदेव ले चले उन्हे नंद-गांव तक !

जमुनाजी कर रही थीं ता-ता थेया ,

आ गये ब्रज मे किशन- कन्हैय्या !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

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