Thursday, August 26, 2010

rakhee 2010

राखी२०१०


पड रही कैसी रिमझिम बुंदिया फ़ुहार?

तन मे लागे आग मन मे जागे ज्वार !

झूले पड गये,पर ना झूले मनवा हमार,

कैसे मनाऊं अबकी राखी को त्योहार ? पड रही.......

सावन लागे भारी इबकी बार ,

जबरन जमीन लै रही ,जे ज़ालिम सरकार !

मै मैके नही जाऊंगी इबकी बार,

लैके रहूंगी अपनौ समपत्ती कौ अधिकार ! पड रही.......

इत सारे देस मा बाढ भरे हुंकार,

जामै डूब गयो खेत-खलिहान औ सारो संसार !

कैसे जाऊं मैके हो गयो बंटा धार,

मैके औ सासरे दोऊ की कैसे होवे नैया पार !

पड रही कैसी रिमझिम बुंदिया फ़ुहार !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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