राखी२०१०
पड रही कैसी रिमझिम बुंदिया फ़ुहार?
तन मे लागे आग मन मे जागे ज्वार !
झूले पड गये,पर ना झूले मनवा हमार,
कैसे मनाऊं अबकी राखी को त्योहार ? पड रही.......
सावन लागे भारी इबकी बार ,
जबरन जमीन लै रही ,जे ज़ालिम सरकार !
मै मैके नही जाऊंगी इबकी बार,
लैके रहूंगी अपनौ समपत्ती कौ अधिकार ! पड रही.......
इत सारे देस मा बाढ भरे हुंकार,
जामै डूब गयो खेत-खलिहान औ सारो संसार !
कैसे जाऊं मैके हो गयो बंटा धार,
मैके औ सासरे दोऊ की कैसे होवे नैया पार !
पड रही कैसी रिमझिम बुंदिया फ़ुहार !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
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