Wednesday, September 3, 2014

संस्कॄति के समन्दर से

संस्कॄति के समन्दर से, सभ्यता का सुर गूंजता है,
समॄद्ध नही है जो, वह इसी के गर्भ मे डूबता है !!
इसके शोर मे भी अलख एक अपने अतीत की है,
जिस पर चिर स्थाई सॄजन फ़िर फ़िर सूझता है !!
नित नई लहरें नये सॄजन की द्स्तक दे रही है,
पुरातन के नित टूटने का भ्रम हर कोई बूझता है!!
सॄष्टि के इस नियम मे बाधक हम क्योंकर बनें,
समॄद्ध है वही संस्कृति जिसमे सृजन ही सूझता है!!
हमारी संस्कॄति के समुद्र-मन्थन की है परिणति,
कि विश्व आज भी हिदू,बौद्ध,जैन धर्म को पूजता है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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