Wednesday, October 22, 2008

दीपावली


कैसी तिम्रछादित मेरी अंतस अयोध्या ,
कलियुग में -
रावन कर गया ,
राम को समूचा आत्मसात !
और मेरे विवेक को दे गया ,
यौवन में ही पक्षाघात !!
आशा के भग्नावशेष खडे हैं ,
जीर्णोधार का भ्रम करने को !
दीपावली कितनी अक्षम है ,
शापित तम कम करने को!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

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