Wednesday, September 12, 2007

प्रीत कि रीत कितनी चुप कितनी शीत१
सुख देता अतीत, दुःख देता अतीत !
वर्तमान का प्रतिक्षण एक सुहाना गीत,
युग भी जाये पल दो पल में बीत!!
संशय भरे भविष्य कि घड़ियों से भयभीत ,
ना जाने कब छिन् जाये यह जीवन संगीत !!
दीपावली
कैसी तिमिराछादित मेरी अंतस अयोद्ध्या ?
कलियुग में रावन कर गया ,
राम को समूचा आत्मसात !
और दे गया ,
मेरे विवेक को पक्षाघात !
आशा के भग्नावशेष खडे हैं,
जीर्णोद्धार का भ्रम करने को !
दीपावली कितनी अक्षम है ,
शापित तम कम करने को !!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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