Monday, April 13, 2015

बैसाखी दी लख लख् वधाईयाँ

गाते फ़िरें बैसाखी दी लख लख्  वधाईयाँ
कुडियाँ उछाला मारती ज्यो होवे सगाईयाँ!
उन्नू के दसियाँ चौपट हो गई फ़सलाँ ?
कुडियो कैवी खुशियाँ ओर कैवी वधाईयाँ?
फ़सलाँ दा त्योहार कैसे जट्ट मणावे ?
जब कुदरत की मार लगावे अँगडाईयाँ !!
झूठी-झूठी मण को दिलासा देवे  बेबे ,
कोई गल नही पुत्तर रब कीसौ परछाईयाँ !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७

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