Friday, July 10, 2015

छितिज़

कभी छितिज़ के उस पार से भी निहारा करो,
रह गया हूँ इस पार मै, तुम ही पुकारा करो!!
हर सुबह जब सूर्य की प्रथम किरण उगती है,
भोर का नही,स्वप्न टूटने का ही इशारा करो!!
दिन भर की व्यस्तता्यें,साँझ तक बोझिल है,
डूबते सूर्य को अंक मे भरने का सहारा करो!!
क्यों दूरियाँ हम, छितिज से नापते रहते है ?
आँखो मे बसी रहो,अहसास मत दुबारा करो!!
बो्धिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

1 comment:

Anonymous said...

अच्छी रचना