Monday, September 7, 2015

चाहता हूँ!

शहर से दूर फ़िर मै गाँव जाना चाहता हूँ!
छल-फ़रेब से फ़कत गुरेज़ पाना चाहता हूँ!!
आपको मुबारक नियत के ये झूठे पैबन्द,
मै  छिपी हिमाकतों को भुलाना चाहता हूँ!!
गये दिन रिश्तों को संज़ीदगी से निभाने के,
रिश्तो के क्त्ल की दास्ताँ सुनाना चाहता हूँ!!
ज़िन्दगी मे अब कितनी तक्क्लुफ़ हो गई है,
दिल और ज़ुबाँ के फ़र्क को मिटाना चाहता हूँ!!
बुझ गये हैं चिराग बहन-बेटी की इज़्ज़त के,
उन चिरागों को फ़िर र्रौशन बनाना चाहता हूँ!!
है ज़रूरत अपनी इबारत फ़िर से लिखने की,
अंग्रेज़ियत ने करा सफ़ाया, बताना चाहता हूँ!!
हम भले,हमारी तह्ज़ीब है सबसे चंगी-भली,
फ़िर उसको उसका ओह्दा दिलाना चाहता हूँ!!
जो नस्ल अपनी ज़मीन खोती चली जा रही,
उस फ़सल और नसल को जगाना चाहता हूँ!!
बोधिसत्व कस्तूरिया२०२नीरव निकुन्ज,सिकन्दरा, आगरा२८२००७

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