उनकी तो सूरत लगती थी भली- भली ,
याद नही किस दो राहे पर वो छोड़ चली !
में तो भुला ना पाउंगा उनके घर की गली,
में तो ठहरा एक बंजारा ,वो नाजों की पली !उनकी तो सूरत ...............
जीवन का आलम यह था शामो-सहर ,
हर रास्ता जाता था उनकी डगर !
एक दिन ऐसा आया वो निकल गई पिय की गली ! उनकी तो सूरत.........
जाबाज़ दिलेरों की तरह ,हमने भी रस्ता छोड़ दिया ,
किसी और पडोसन को अपना बना उस से मुह मोड़ लिया !
हम तो ठहरे प्यासे भोंरे ,ढूँढ ली एक और कली ! उनकी तो सूरत ........
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज sikandraa आगरा 282007
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2 comments:
बहुत अच्छे. :)
bhut sundar rachana ki hai apne. badhai ho. likhate rhe.
aap apna word verification hata le taki humko tipani dene me aasani ho.
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