Friday, May 13, 2016

विश्वास


गर मुझे उसके ज़ज़्बात का अहसास होता, वो मेरे नज़दीक होती,मै उसके पास होता!! ख्वाबों की तामीर को न इस कदर बनाते, न गिरने की आहट होती,न विश्वास होता!! काश मेरे ज़ज़्बात,मेरे आईने से परखे होते, न उसे कोई शक,न मै यूँ बदहवास होता!! पर अब अफ़सोस करने से भी क्या फ़ायदा? न मिलते,न गिले-शिकवों का अहसास होता!! सुन अपनो से ही गिले शिक्वे हुआ करते है, गर मानते गैर ,तो तू क्यूँ अपना खास होता!! बोधिसत्व कस्तूरिया२०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा-२८२००७

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