है समय उठो अबला से सबला बन जाओ !
परिवार-प्रेम त्याग,राश्ट्र-प्रेम से जुड जाओ!!
सभ्य-सुसंक्रत समाज की तुम ही धाती हो ,
हर संकट से लडने को तुम आगे आती हो!!
धीरज,धर्म और समर्पण तेरे ही आभूषण हैं,
जो"भोग्या’ समझे तुझे, वो स्वयं प्रदूषण हैं!!
धिक्कार!वो पुरुष ,जो तुझसे व्यभिचार करे,
प्रणाम उसे जो तेरा सम्मान व सतकार करे!!
मन से मॄदुल रहकर भी,माँ-दुर्गा बन जाओ !
कलुष-नियत धारी पर ,ले खडग तन जाओ!!है समय उठो अबला से सबला बन जाओ !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७


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